Odisha Orangutan News: इंसानों के साथ करीब 97 फीसदी डीएनए साझा करने वाले एक दुर्लभ महावानर प्रजाति के पांच सदस्यों के अचानक ओडिशा के जंगल में मिलने से हर कोई हैरान रह गया। देखते ही देखते यह खबर देशभर में चर्चा का विषय बन गई। हम बात कर रहे हैं ओरंगुटान की, जो प्राकृतिक रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के बोर्नियो और सुमात्रा के वर्षावनों में पाए जाते हैं। 8 सितंबर को ओडिशा के बालासोर जिले के भोगराई इलाके में ग्रामीणों ने जंगल में पांच छोटे ओरंगुटान देखे। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और सभी पांचों को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया।
ओरंगुटान भारत के जंगल तक पहुंचे कैसे?
इस मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है। वन अधिकारियों के मुताबिक ओरंगुटान के अपने आप इतनी दूर भारत के इस हिस्से तक पहुंचने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि यहां उनके प्राकृतिक आवास से कोई वन्यजीव कॉरिडोर जुड़ा नहीं है। इसी वजह से मानवीय हस्तक्षेप और अवैध वन्यजीव तस्करी की आशंका की जांच की जा रही है।
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ओडिशा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (WCCB) की टीम मामले की जांच कर रही है। जांच में वाहनों की आवाजाही और अन्य सुरागों को भी खंगाला जा रहा है। हालांकि, अभी तक तस्करी के आरोप की अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन संभावना जताई जा रही है कि उक्त घटना के पीछे संभावित रूप से तस्करों का हाथ हो सकता हैं।
पेड़-आधारित जीवन जीने (Odisha Orangutan News) वाले महावानर

ओरंगुटान का प्राकृतिक घर गर्म और नम उष्णकटिबंधीय वर्षावन हैं। बोर्नियन ओरंगुटान निचले वर्षावनों के अलावा दलदली और पहाड़ी जंगलों में भी पाए जाते हैं। ये पेड़-आधारित जीवन जीने वाले महावानर हैं और अपना अधिकांश समय पेड़ों पर ही बिताते हैं। अपनी लंबी और मजबूत भुजाओं तथा पकड़ बनाने वाले हाथ-पैरों की मदद से ये पेड़ों की शाखाओं के बीच आसानी से आवाजाही करते हैं।
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इनके भोजन में फल प्रमुख होते हैं, लेकिन उपलब्धता के अनुसार ये पत्तियां, नई टहनियां, फूल, पेड़ की छाल और कीड़े भी खाते हैं। रात में ये पेड़ों पर ही पत्तियों और शाखाओं से घोंसले जैसी संरचना बनाकर सोते हैं।
जानकारी से साफ है कि ओडिशा का मौसम गर्म और नम है और राज्य में कई तरह के वन मौजूद हैं, लेकिन बालासोर का यह कैसुरीना वन ओरंगुटान का प्राकृतिक आवास नहीं है। ओरंगुटान को घने उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की ऊंची वृक्ष-छतरी, भोजन की पर्याप्त उपलब्धता और उसी तरह के वन पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत होती है। जो ओडिशा में उपलब्ध नहीं है। सवाल काफी है…लेकिन जबाव जांच के बाद ही सामने आयेंगे।


