Paper leak case:हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ शिकायतें बहुत हैं, लेकिन समाधान बहुत कम हैं। हम समस्याओं को तुरंत पहचान लेते हैं, उन पर आरोप भी लगा देते हैं, लेकिन जब समाधान की बात आती है तो हमारे पास भी कोई ठोस जवाब नहीं होता।
आज भारत का एक बड़ा युवा वर्ग शिकायत करने की आदत का आदी होता जा रहा है। उसे जिम्मेदारी भी दे दी जाए, तो शिकायत का विषय बदल जाएगा, लेकिन शिकायत खत्म नहीं होगी।
पिछले दिनों जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन में भी यही देखने को मिला। जो भी नेतृत्व कर रहा था या आंदोलन में शामिल था, लगभग हर कोई व्यवस्था की कमियाँ गिना रहा था। समस्याएँ सबके पास थीं, लेकिन समाधान बहुत कम दिखाई दिए।
परनिंदा करना, आलोचना करना, समीक्षा करना, किसी की कमी निकालना या दोषारोपण करना बहुत आसान है। मुश्किल काम है समाधान ढूँढ़ना और उसके लिए जिम्मेदारी लेना। दुर्भाग्य से (Paper leak case) आज देश का एक बड़ा युवा वर्ग पहले रास्ते को ज्यादा आसान मान बैठा है।
आज समाधान से (Paper leak case) पहले शोर
बचपन में जिद करके अपनी हर बात मनवा लेने की आदत, धीरे-धीरे शैक्षणिक संस्थानों से निकलकर अब सरकारों पर दबाव बनाने की संस्कृति तक पहुँचती दिखाई देती है। अपनी बात रखना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हर समस्या का उत्तर केवल विरोध नहीं हो सकता।
आप स्वाद लेकर कह सकते हैं कि ZEN -G ने यह कर दिया, वह कर दिया। लेकिन सच यह है कि समस्याएँ नई नहीं हैं। ये समस्याएँ मिलेनियल्स ने भी देखीं, उनसे पहले की पीढ़ियों ने भी देखीं। फर्क इतना था कि पहले लोग समस्या के साथ समाधान भी खोजने की कोशिश करते थे। आज कई बार समाधान से पहले शोर ज्यादा दिखाई देता है।

यह भी समझना होगा कि केवल किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के इस्तीफे से व्यवस्था नहीं बदल जाती। किसी भी व्यवस्था को सुधारने के लिए हजारों लोग, विशेषज्ञ और अधिकारी मिलकर काम करते हैं। उन्हीं टीमों में वही तथाकथित ZEN -G भी शामिल है, जिसकी चर्चा अक्सर होती है। यानी मौका भी है और (Paper leak case) जिम्मेदारी भी, लेकिन क्या समाधान खोजने का उतना ही प्रयास है?
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अपने आप से कुछ सवाल पूछिए-
- पर लीक कौन करता है?
- पेपर खरीदता कौन है?
- नकल कौन करता है?
- नकल करवाता कौन है?
ये सब इसी समाज के लोग हैं। नीट का पेपर लीक हुआ, तो उसे खरीदने वाला भी कोई विद्यार्थी ही रहा होगा, क्योंकि उस पेपर की जरूरत उसी को थी। अगर व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, तो समाज भी उससे पूरी तरह अलग नहीं है। समस्या केवल सिस्टम में नहीं है, समस्या नागरिक के चरित्र में भी है।
जिस दिन हमारे भीतर नैतिकता का जागरण होगा, उसी (Paper leak case) दिन बदलाव दिखाई देना शुरू होगा। क्योंकि अंत में व्यवस्था वही बनती है, जिसे समाज अपने व्यवहार से गढ़ता है।
आज जंतर-मंतर में बैठे लाखों युवाओं में से ही कल कोई प्रशासन में जाएगा, कोई न्यायपालिका में होगा, कोई राजनीति में और कोई शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनेगा। उस दिन उनके पास व्यवस्था बदलने का अवसर होगा। तब उन्हें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि क्या वे वही करेंगे जिसकी आज आलोचना कर रहे हैं, या सच में कोई बेहतर (Paper leak case) उदाहरण पेश करेंगे।
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आखिरकार बदलाव की शुरुआत हमेशा अपने भीतर से होती है

