Maa Chandraghanta: आज शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप देवी चंद्रघंटा की पूजा का विधान है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप साहस और शौर्य का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव से विवाह के बाद मां पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया था। यह अर्धचंद्र घंटे के आकार जैसा दिखाई देता है, इसलिए मां पार्वती के इस स्वरूप को ‘चंद्रघंटा’ कहा गया।
मां चंद्रघंटा की (Maa Chandraghanta) उत्पत्ति
पर्वतराज हिमवान और रानी मेनावती की पुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव विवाह के लिए राजी हुए।
कथा के अनुसार, विवाह के समय शिव का भस्म से ढका रूप, जटाएं, सर्प और उनके गणों की विचित्र बारात देखकर पार्वती के परिवार और अन्य लोग घबरा गए। तब पार्वती ने चंद्रघंटा का शक्तिशाली स्वरूप धारण किया। कथा के इस रूप में उनके प्रयास से शिव ने भी मनोहर और (Maa Chandraghanta) राजसी रूप धारण किया, जिसके बाद विवाह संपन्न हुआ।
एक और कथा के अनुसार, जब असुरों के अत्याचार से देवता परेशान हुए, तब देवी ने चंद्रघंटा का स्वरूप धारण किया। कथा में बताया गया है कि देवताओं ने देवी को अलग-अलग दिव्य वस्तुएं और आयुध दिए। इसके बाद देवी महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं। देवी का विशाल स्वरूप देखकर महिषासुर को अपने अंत का आभास हुआ, लेकिन उसके असुरों ने युद्ध जारी रखा। अंततः देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की।

दस भुजाओं वाला विशाल स्वरूप
माता चंद्रघंटा का स्वरूप दस भुजाओं वाला निर्भीक, साहस और शौर्य का प्रतीक है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि जीवन में शांति और सौम्यता के साथ अन्याय तथा नकारात्मक शक्तियों का सामना करने के लिए साहस भी जरूरी है। मान्यता है कि उनकी आराधना से भक्तों में आत्मविश्वास बढ़ता है और भय से मुक्ति मिलती है।
नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा क्यों होती है? जानिए धार्मिक महत्व
बता दें, नवरात्रि के तीसरे दिन मां की पूजा करते समय भक्त अपने जीवन में संयम, धैर्य और साहस बनाए रखने का संकल्प भी लेते हैं। इस स्वरूप का आध्यात्मिक संदेश है कि कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय विवेक और आत्मविश्वास के साथ उनका (Maa Chandraghanta) सामना करना चाहिए।
Follow the Daily Awaz Bharti channel on WhatsApp

